बिहार की राजनीति में एक बड़ा मोड़ आया है। ३१ मार्च २०२६ को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, Chief Minister of Bihar Government और नितिन नाविन ने अपने संविधानमंडलीय पदों से इस्तीफा दे दिया है। यह कदम उन्हें Rajya Sabha में चुने जाने के तुरंत बाद उठाना था, क्योंकि संवैधानिक नियम के तहत एक व्यक्ति दो अलग-अलग सदन के सदस्य नहीं हो सकता। लेकिन यह सिर्फ एक औपचारिकता नहीं थी। यूपीए और एनडीए के बीच चल रहे खेल में इसका असर सीधा लगा। दोनों नेताओं का नाम राज्यसभा में १६ मार्च २०२६ को शामिल किया गया था, जिसके बाद उन्हें ३१ मार्च तक अपना मौजूदा पद छोड़ना अनिवार्य था। यहाँ बातचीत इस बारे में होती रही कि क्या यह परिवर्तन बिहार के शक्ति समीकरण को बदल देगा।
वीरेश चौधरी, जो जदयू के वरिष्ठ नेता हैं, ने पुष्टि की कि नीतीश कुमार ने अपना इस्तीफा विधान परिषद के सभापति के पास जमा करा दिया है। दूसरी तरफ, बीजेपी नेता संजय सरावगी ने बताया कि नितिन नाविन का इस्तीफा विधान सभा स्पीकर ने स्वीकार कर लिया है। इस प्रक्रिया में कोई झगड़ा नहीं हुआ, यह पूरे तरह से शांतिपूर्ण तरीके से चला। विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने खुद इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा, "हाँ, मैंने नीतीश कुमार का विधान परिषद सदस्य पद से इस्तीफा प्राप्त किया है और उसे स्वीकार कर लिया है।" उनकी घोषणा के साथ ही पद खाली होने की प्रक्रिया शुरू हो गई। इसका मतलब है कि इन सीटों को भरोसेमंद रूप से भरने के लिए नई बैलिस्ट्रिंग होगी।
यह पहली बार नहीं है जब नीतीश कुमार ने राजनीति में बदलाव किया है। उनका राजनीतिक करियर १९८५ से शुरू हुआ था, जब वे हरनाउ से विधायक बने थे। बाद में १९८९ में वे लोक सभा सांसद भी रहे। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण चीज़ यह है कि २००६ से वे बिहार विधान परिषद के सदस्य थे। ७ मई २०२४ को उन्हें चौथी बार चुना गया था, जिसका कार्यकाल २०३० तक चलना था। अब वह अवधि पहले ही समाप्त हो गई है क्योंकि उन्हें राज्यसभा का कार्यकाल शुरु करना है।
वे दुनिया के उन चुनिंदा राजनेताओं में शामिल होंगे जिन्होंने विधान सभा, विधान परिषद, लोक सभा और राज्यसभा – चारों घरों में सेवा की है।
१० अप्रैल २०२६ को वे शपथ ग्रहण करने की संभावना रखते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक स्थानांतरण नहीं, बल्कि उनके राष्ट्रीय राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने का संकेत है।
नितिन नाविन के मामले में कहानी थोड़ी अलग है। बैंकपुर से विधायक रहते हुए, वे लगातार इस क्षेत्र को प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। हाल ही में उनका बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना एक बड़ी घटना थी। इस पृष्ठभूमि में राज्यसभा जाना एक स्पष्ट संकेत है कि पार्टी उन्हें दिल्ली के केंद्र से ज्यादा दूर नहीं करना चाहती। राज्यसभा चुनाव की धारा ८४ के नियमों के अनुसार, जब कोई सदस्य ऊँचे सदन जाता है तो निचले सदन का पद स्वतः खाली हो जाता है। हालांकि, इसे फॉर्मल रूप से स्वीकार करना ज़रूरी है। इस प्रक्रिया में किसी देरी का कोई कारण नहीं था, दोनों ने समय से पहले ही कार्रवाई कर दी।
अब सवाल यह है कि खाली हुई सीटें किस तरह से भरी जाएंगी? बिहार विधान परिषद और विधान सभा में उत्तरपक्ष के लिए उपचुनाव (By-elections) लागू होते हैं। इसका मतलब है कि जदयू और बीजेपी को फिर से नए चेहरों को तैयार करना होगा। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यह निर्णय बिहार में शक्ति समीकरण को दोबारा ढालेगा। हालांकि नीतीश कुमार अभी भी मुख्यमंत्री के पद पर बने रहेंगे, लेकिन विधायिका में उनकी अनुपस्थिति एक खालीपन पैदा करती है। यह बदलाव दोनों दलों – जदयू और बीजेपी के आंतरिक गठबंधन को नई ताकत दे सकता है।
हाँ, नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के पद पर बने रहेंगे। उन्होंने सिर्फ विधान परिषद (MLC) का पद त्याग दिया है, न कि मुख्यमंत्री का। संवैधानिक नियम केवल राज्यसभा की सदस्यता और विधान परिषद/सभा के पद को एक साथ रखने पर रोक लगाता है।
विधान परिषद और विधान सभा की खाली सीटों के लिए 'उपचुनाव' (By-election) आयोजित किए जाने की संभावना है। भाजपा और जदयू अपनी अपनी ओर से ऐसे उम्मीदवार चुनेंगे जो इन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करें।
नितिन नाविन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। राज्यसभा जाते हुए, उनकी राष्ट्रीय रणनीति में योगदान बढ़ेगा। बैंकपुर से विधायक पद त्यागना इस संकेत की पुष्टि करता है कि उनका ध्यान अब राष्ट्रीय स्तर पर है।
सरकारी कार्यों पर सीधा असर नहीं होगा क्योंकि मुख्यमंत्री बना रहेंगे। हालांकि, विधान परिषद में जदयू के प्रभाव में थोड़ी कमी आएगी जब तक नए सदस्य चुने नहीं जाते।