अलाखपुरा की 7 बेटी चुनिंदा, भारतीय फुटबॉल में 'मिनी ब्राजील' का कमाल

मार्च 26, 2026 0 टिप्पणि Priyadharshini Ananthakumar

हरियाणा के भिवानी जिले में स्थित एक छोटा सा गाँव अलाखपुरा, अपनी खेलकूद में इतिहास रच रहा है। यहाँ से निकलीं सात बेटी अब भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीमों का हिस्सा हैं। यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है; जब किसी गाँव की बात आती है, तो उम्मीद होती है कि वहाँ से एक-दो खिलेड़ ही निकलेगा, लेकिन अलाखपुरा ने इसकी खासी सारी परंपराओं को तोड़ा है। गाँव को यहाँ तक कि 'मिनी ब्राजील' भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ से फुटबॉल की चमकदार तारागण सीमा पार कर रही हैं।

एक गाँव से सात ताज

कोच सोनिका के अनुसार, अभी हाल ही में हुई चयन प्रक्रिया में इनमें से सात लड़कियों का नाम शामिल हुआ है। यह चित्र कुछ इस तरह है—संजू यादव सीधे सीनियर भारतीय टीम में जगह बना चुकी हैं। वहीं, पुजा जाखड़, मुस्कन, पारुल, हिमांशु और रीतु जैसे नाम युवा वर्ग में चमक रहे हैं। ये सभी भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम (Under-20) का हिस्सा हैं। सबसे छोटी स्विता को 17 साल से कम उम्र वाली टीम में चुना गया है। यह सिर्फ एक घटना नहीं है, बल्कि लगातार होने वाली प्रगति है।

सोचिए, एक गाँव से एक साथ सात खिलाड़ियों का कभी भी देश की ओर से चुना जाना, यह आम बात नहीं थी। पहले गुरुवार के दिन जब यह खबर आते ही ग्रामीण समिति में उत्साह था। कोच सोनिका का कहना है कि "ये सफलता हमारे गाँव के मेहनतकाशी का परिणाम है। यहाँ फुटबॉल को कोई बच्चों का खेल नहीं, बल्कि जीवन का जरिया माना जाता है।"

फील्ड से बेहतर रोज़गार की राह

पर कहानी सिर्फ खेल तक सीमित नहीं है। असली बदलाव उस गाँव में देखने को मिल रहा है जहाँ फुटबॉल खेलने के बाद भी कई लड़कियों ने अपना मार्ग खुद ढूंढ लिया है। अलाखपुरा की 30 से अधिक युवतियों ने अब भारतीय सेना और भारतीय रेलवे में नौकरियां प्राप्त की हैं।

इसका मतलब क्या हुआ? परिवार अब आर्थिक रूप से सक्षम हुए हैं। जब एक बेटी सरकार की नियुक्ति ले लेती है, तो पूरे घर की दहेज मांग या पिछड़ेपन की थरथराहट खत्म हो जाती है। यह आत्मनिर्भरता का नया रूप है। जो महीनों मैदान में पसीना बहाती थीं, वही अब अपने परिवार की कमान संभाल रही हैं। इस प्रकार, खेल यहाँ सिर्फ शौक नहीं, बल्कि पहचान और सुरक्षा दोनों बन गए हैं।

मध्य प्रदेश से नई आशा

मध्य प्रदेश से नई आशा

तो क्या अलाखपुरा ही ऐसा अकेला गाँव है? बिल्कुल नहीं। मध्य प्रदेश में भी एक 'मिनी ब्राजील' गाँव देखा जा सकता है। वहाँ की 15 वर्षीय लड़की सनिया कुंदे ने भी खेल में अपनी छाप छोटी है। संजय यादव या अन्य खिलाड़ियों से जुड़ी बातचीत में संनिया के जूनियर अवधारणाओं का उल्लेख किया गया था। वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का झंडा ऊँचा उठाने का सपना देख रही हैं।

उनका जुनून इतना गहरा है कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 की तैयारी के दौरान उनकी कृति लोगों को प्रेरणा देने वाले हैं। यह दिखाता है कि भारत में खेल विकास के केन्द्र विभिन्न राज्यों में बिखरे हुए हैं। भिवानी की धूल में या मध्य प्रदेश के मैदानों में, लड़कियां अब अपनी मर्जी से अपना भविष्य लिख रही हैं।

ग्रामों से वैश्विक स्तर की यात्रा

ग्रामों से वैश्विक स्तर की यात्रा

विकास केवल खिलाड़ी तक सीमित नहीं है, पूरा गाँव इसके साथ आगे बढ़ रहा है। अलाखपुरा जैसी गांवों का उदाहरण अब नीति निर्माताओं के लिए भी एक मॉडल है। जब स्थानीय नेता और शिक्षकों का ध्यान खेल के मैदानों में टिकता है, तो परिणाम अलग होते हैं। हालांकि, यह प्रश्न भी रहता है कि क्या अन्य गांवों में भी ऐसी संसाधनों की व्यवस्था हो सकती है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अलाखपुरा गाँव में फुटबॉल क्यों लोकप्रिय है?

यहाँ फुटबॉल के लिए सहज वातावरण और कोचिंग सुविधाएं उपलब्ध हैं। कोच सोनिका और स्थानीय नेतृत्व ने लड़कियों को खेलने के लिए प्रोत्साहित किया है, जिससे गाँव को 'मिनी ब्राजील' का उपनाम मिला है।

इन खिलाड़ियों के पास नौकरी के कैसे अवसर मिले?

खेल करने की कौशल ने उन्हें अनुशासित बनाया, जिसने उन्हें भारतीय सेना और रेलवे जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में प्रवेश दिलवाने में मदद की। आज 30 से अधिक लड़कियां सैन्य या सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत हैं।

सनिया कुंदे की उम्र और लक्ष्य क्या हैं?

15 वर्षीय संनिया कुंदे मध्य प्रदेश से हैं और उनका लक्ष्य भारतीय राष्ट्रीय महिला टीम में स्थान पाना है। वे वर्तमान में यूथ क्लब के साथ कड़ी मेहनत कर रही हैं।

कोच सोनिका क्या कहती हैं?

कोच सोनिका का मानना है कि सफलता मेहनत और समुदाय का समर्थन दोनों से मिलती है। उन्होंने कहा कि इन लड़कियों ने अपने गाँव का नाम रोशन किया है और यह और अधिक लड़कियों के लिए प्रेरणा है।