दो दिन की बातचीत, चार संवेदनशील मुद्दे और एक साफ संदेश—नई दिल्ली ने वांग यी के दौरे पर यह स्पष्ट कर दिया कि संबंध तभी पटरी पर लौटेंगे जब सीमा शांत रहे, आतंकवाद पर ठोस कदम दिखें, ब्रह्मपुत्र पर पूरी पारदर्शिता हो और ताइवान पर भारत की पुरानी नीति का सम्मान किया जाए। यह दौरा सिर्फ शिष्टाचार नहीं था; यह चीन-भारत वार्ता का वह दौर था जिसमें हर मुश्किल मुद्दा टेबल पर था।
चीनी विदेश मंत्री वांग यी 18-19 अगस्त 2025 को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के आमंत्रण पर दिल्ली पहुंचे। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की, विदेश मंत्री एस. जयशंकर से लंबी बातचीत की और सीमा मुद्दे पर विशेष प्रतिनिधियों की 24वीं वार्ता की सह-अध्यक्षता की। एजेंडा व्यापक था—सीमा पर तनाव कम करना, विवादित इलाकों की स्थिति स्पष्ट करना, और द्विपक्षीय एजेंडा में अटके धागे सुलझाना।
सीमा पर फोकस सबसे ज्यादा था। विशेष प्रतिनिधियों की बैठक में पूर्वी लद्दाख के शेष तनाव बिंदुओं—जैसे देपसांग और देमचोक—पर प्रगति की जरूरत पर जोर हुआ। भारतीय पक्ष का रुख वही रहा: अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति बहाल किए बिना संबंध सामान्य नहीं हो सकते। यही संदेश विदेश मंत्री स्तर की वार्ता में भी दोहराया गया कि एलएसी पर शांति और स्थिरता ही बाकी क्षेत्रों में सहयोग की नींव है।
पिछले चार वर्षों में कोर कमांडर स्तर की 20 से ज्यादा बैठकों और WMCC जैसे तंत्रों के जरिए कई जगहों से सैनिक पीछे हटे हैं, पर गश्त के अधिकार, बफर जोन के आकार और निगरानी ढांचे पर मतभेद बाकी हैं। 1993 और 1996 के सीमा शांति समझौते, 2005 और 2013 के प्रोटोकॉल—इन सभी का संदर्भ लेते हुए नियम-आधारित व्यवस्था पर वापसी की बात हुई, ताकि अकस्मात भिड़ंत की गुंजाइश कम हो।
आतंकवाद पर भारत ने बेहद सख्त लहजा अपनाया। संदेश साफ था—सीमा पार से प्रायोजित हिंसा और वैश्विक मंचों पर आतंकी नामजदगी को रोके जाने जैसे कदम रिश्तों को खराब करते हैं। चर्चा में संयुक्त राष्ट्र 1267 समिति में बार-बार लगने वाले ‘टेक्निकल होल्ड’, एफएटीएफ की प्राथमिकताएं और एससीओ के आतंकवाद-रोधी ढांचे (RATS) में ठोस सहयोग जैसे बिंदु उठे। वांग यी ने प्राथमिकता के तौर पर आतंकवाद से निपटने पर सहमति जताई—यह छोटी बात नहीं, क्योंकि इसी महीने चीन एससीओ शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है और एजेंडा तय करने में उसकी भूमिका निर्णायक है।
दिल्ली की नजर इस बात पर भी है कि इस सहमति का असर जमीनी फैसलों में दिखे—उदाहरण के लिए, आतंकी संगठनों और सरगनाओं पर नामजदगी के मामलों में अड़चनें न लगें, और सीमा पार नेटवर्क पर संयुक्त कार्रवाई हो। आने वाले हफ्तों में एससीओ की बैठकों और द्विपक्षीय सुरक्षा वार्ताओं में इसकी परख होगी।
ब्रह्मपुत्र पर चीन की मेगा हाइड्रो परियोजना भारत के लिए बड़ा चिंता विषय बनी हुई है। तिब्बत में यारलुंग त्संगपो के ‘ग्रेट बेंड’ क्षेत्र में प्रस्तावित विशाल बांध को लेकर जयशंकर ने ‘पूरी पारदर्शिता’ की मांग दोहराई। मुद्दा सिर्फ बिजली उत्पादन का नहीं है; प्रवाह में अचानक बदलाव, तलछट का रुझान, बाढ़ का जोखिम और असम-अरुणाचल की आजीविका पर असर जैसे ठोस सवाल हैं।
भारत और चीन के बीच 2006 का ट्रांस-बॉर्डर नदियों पर विशेषज्ञ-स्तरीय तंत्र (ELM) और मानसून के दौरान जल-स्तर के डेटा साझा करने की व्यवस्था पहले से है। भारत चाहता है कि इन्हें विस्तार मिले—रियल-टाइम डेटा, अग्रिम चेतावनी, और परियोजना डिजाइन की तकनीकी जानकारी तक पहुंच, ताकि डाउनस्ट्रीम प्रबंधन बेहतर हो सके। चीन ने सुनने का संकेत दिया है, पर दिल्ली चाहती है कि यह संकेत समयबद्ध और लिखित प्रोटोकॉल में बदले।
ताइवान पर भारत ने अपना परिचित और स्थिर रुख दोहराया—कोई बदलाव नहीं। नई दिल्ली ने साफ किया कि ताइवान के साथ उसके आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक संबंध जारी रहेंगे, जैसे दुनिया के कई देश करते हैं। दिलचस्प यह रहा कि भारतीय पक्ष ने यह भी याद दिलाया कि बीजिंग खुद भी इन क्षेत्रों में ताइवान से काम करता है। मतलब, व्यावहारिक सहयोग को विवाद का कारण नहीं बनाया जाना चाहिए।
व्यापार मोर्चे पर कुछ रुकावटें नरम पड़ती दिखीं। वांग यी ने दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ्स), उर्वरकों और बड़ी टनल बोरिंग मशीनों के निर्यात से जुड़ी बाधाओं पर समाधान की दिशा में काम करने का भरोसा दिया। भारत के लिए यह अहम है—ईवी, इलेक्ट्रॉनिक्स और पवन ऊर्जा जैसी इंडस्ट्री रेयर अर्थ्स पर निर्भर हैं; मेट्रो, हाईवे और नदियों के नीचे की सुरंगों के लिए उन्नत टीबीएम जरूरी हैं; उर्वरक आपूर्ति किसानों के लिए सीधे-सीधे कीमत और उपलब्धता का सवाल है।
बीते वर्षों में दोनों तरफ गैर-शुल्क बाधाएं बढ़ी थीं—लाइसेंसिंग, सर्टिफिकेशन, और अनुपालन के नाम पर देरी। अब संकेत यह है कि संवेदनशील मदों में विवेकपूर्ण ढील, मानकों की पारस्परिक मान्यता और कस्टम क्लियरेंस की गति पर ठोस कदम संभव हैं। अगर यह वादे ठोस समय-सारिणी के साथ लागू होते हैं, तो व्यापारिक अनिश्चितता घटेगी और सप्लाई चेन ज्यादा भरोसेमंद होंगी।
बड़ी तस्वीर में देखें तो रिश्तों में धीरे-धीरे गर्मी लौटने के संकेत हैं, लेकिन भरोसा अभी अधूरा है। सुरक्षा तालमेल बनाम रणनीतिक अविश्वास—यही वर्तमान समीकरण है। एक ओर दिल्ली ने दो-टूक कहा कि सीमाई शांति जरूरी शर्त है, दूसरी ओर बीजिंग ने आतंकवाद और व्यापारिक रुकावटों पर कदम बढ़ाने का संकेत दिया। ब्रह्मपुत्र पर पारदर्शिता और ताइवान पर संवेदनशीलता—ये दो कसौटियां अब भी निर्णायक रहेंगी।
आगे क्या? संकेत हैं कि WMCC और ELM जैसी तकनीकी समितियां जल्द मिल सकती हैं, ताकि SR वार्ता के राजनीतिक निर्देशों को फॉलो-अप मिल सके। एससीओ शिखर सम्मेलन इस माह चीन में होने जा रहा है—वहीं पता चलेगा कि आतंकवाद पर सहमति घोषणाओं से आगे बढ़ी या नहीं। साथ ही, सीमा के बचे हुए तनाव बिंदुओं पर गश्त अधिकार और बफर जोन की सीमारेखा जैसे पेचीदा फैसले अब कूटनीतिक चतुराई से ज्यादा राजनीतिक इच्छाशक्ति मांगते हैं। नई दिल्ली ने अपने पत्ते खोल दिए हैं—अब नजर बीजिंग की चाल पर है।
8 जवाब
भारत की सीमा पर शांति ही सबसे बड़ी जीत है।
ब्रह्मपुत्र के जल‑समस्या पर चीन की मेगा‑डैम योजना वास्तव में गंभीर चिंता पैदा करती है।
दिल्ली ने कहा है कि रियल‑टाइम डेटा साझा किया जाना चाहिए, ताकि बाढ़ और जल‑वायु परिवर्तन से निपटा जा सके।
इसके अलावा, दोनों देशों के बीच 2006 का ELM तंत्र मौजूदा डेटा शेयरिंग को बेहतर बनाना चाहिए।
यदि यह औपचारिक प्रोटोकॉल बन जाता है, तो स्थानीय किसानों की आजीविका में सुधार होगा।
ताइवान पर भारत की स्थिर नीति के पीछे आर्थिक हित भी छुपे हैं।
बीजिंग को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि व्यापारिक तालमेल बगड़ न जाए।
सिर्फ शब्दों से नहीं, काम की जरूरत है।
वांग यी ने कहा था, पर क्या अब कार्रवाई होगी?
सीमा‑शांति के बिना दोनो देशों का भविष्य अनिश्चित रहेगा 😕
आतंकवाद के मुद्दे पर अगर ठोस कदम नहीं उठाए तो सभी समझौते धूमिल पड़ेंगे।
चलो, उम्मीद है इस बार दोनों पक्ष वास्तविक कार्रवाई करेंगे।
हम्म... एey बात सरहद पर बढ़ती tension बग़ैर कोई स्पष्टीकरण नहीं चलेगी।
डाटा शेयरिंग के protocol को लिखित रूप में बदलना जरूरी है, वरना जंक्शन हॅपते रहेंगे।
चीन को भी समझना चाहिए कि भारत का patience अनंत नहीं है।
वांग यी की दिल्ली यात्रा में जो टेबल पर रखे मुद्दे थे, वो सभी सालों से छिपे खतरों की लिस्ट की तरह दिखते हैं।
सीमा पर शांति के लिए दोनों पक्षों को न सिर्फ शब्दों में, बल्कि जमीन पर भी कदम बढ़ाने होंगे।
देमचोक और देपसांग जैसे घाटे वाले क्षेत्र अभी भी टनाटन कर रहे हैं।
अगर गश्त अधिकार और बफर जोन का स्पष्ट प्रोटोकॉल नहीं बना, तो कोई भी समझौता खाली पान रहेगा।
ब्रह्मपुत्र पर चीनी जलविद्युत योजना भारत की पानी की सुरक्षा को सीधे खतरे में डाल रही है।
ऐसे में रियल‑टाइम जल‑स्तर डेटा और एरर अलर्ट सिस्टम का होना अनिवार्य है।
इसीलिए भारत ने ELM तंत्र को विस्तारित करने की माँग की है, न कि सिर्फ पुरानी रिपोर्टिंग।
ताइवान पर भारत की नीति का कोई भी बदलाव शांति को नहीं, बल्कि नई उलझनें पैदा कर सकता है।
चीन का इस पर हल्का‑फुल्का रुख भारत को सतह पर आराम देता है, पर गहरी जड़ें अभी भी सूख नहीं रही।
आतंकवाद मुद्दे पर दोनों देशों की वैध प्रतिबद्धता बिना कार्रवाई के मतलब नहीं बनता।
अगर UN 1267 में टेक्निकल होल्ड हटता है, तो जल्द ही सीमा‑पार समूहों को रोकना आसान होगा।
सप्लाई चेन में रेयर अर्थ्स की निर्यात में बाधाओं को हटाने से दोनों अर्थव्यवस्थाओं को फायदा होगा।
उर्वरक और TBM जैसी तकनीकें भारतीय किसानों और बुनियादी ढाँचे के लिए जिंदगी की धड़कन हैं।
यदि इन क्षेत्रों में वास्तविक डील नहीं हुई, तो व्यापारिक भरोसा फिर से टूटेगा।
आख़िरकार, डिप्लोमेटिक शब्दों की बारीकियों को लेकर नहीं, बल्कि ठोस कार्य‑योजनाओं पर भरोसा होना चाहिए।
इंसाफ़ की डिग्री नहीं, बल्कि इरादों की हकीकत मायने रखती है।
अगर दोनों देश सच्ची इच्छा से आगे बढ़ें तो बहुत कुछ बदल सकता है।