जुलाई 2025 के अंत तक, छत्तीसगढ़ पुलिस और मध्यप्रदेश पुलिस ने एक अद्वितीय सफलता हासिल की — 229 से अधिक लुप्त बच्चों को उनके परिवारों के साथ जोड़ दिया। यह उपलब्धि ऑपरेशन मुस्कान के तहत हुई, जो भारत के केंद्रीय क्षेत्र में लुप्त बच्चों को ढूंढने के लिए अब तक की सबसे व्यवस्थित और बहु-राज्यीय पुलिस अभियान बन गई। यह सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं, बल्कि एक जीवन बचाने का वादा था — और इसने उन घरों को फिर से जीवित कर दिया जहां आशा बुझ चुकी थी।
बिलासपुर जिले में, छत्तीसगढ़ पुलिस ने जुलाई के एक महीने में 151 बच्चों को बचाया — 14 लड़के और 137 लड़कियाँ, जिनकी उम्र 6 से 9 साल के बीच थी। यह नंबर राज्य भर में किसी भी जिले की तुलना में सबसे अधिक है। एएसपी अर्चना झा ने बताया कि टीमें महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब और मध्यप्रदेश तक फैली थीं। कुछ बच्चे ट्रेन स्टेशनों पर, कुछ बाजारों में, कुछ तो घरों के पीछे छिपे हुए मिले — जहाँ उनकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था।
इसके बाद, एसएसपी राजनेश सिंह ने घोषणा की कि इन पुलिसकर्मियों को मौद्रिक पुरस्कार और सम्मान दिया जाएगा। एक अधिकारी ने बताया, "हमने उन बच्चों को ढूंढा, जिनके माता-पिता ने सालों तक फोन किया, पोस्टर चिपकाए, और फिर भी निराश होकर आँखें बंद कर लीं।"
मध्यप्रदेश के जबलपुर में, ऑपरेशन मुस्कान का समय अधिक लंबा था — जनवरी से नवंबर 2025 तक। एसपी संपत उपाध्याय ने व्यक्तिगत रूप से इस अभियान की निगरानी की। यहाँ 53 लड़कियाँ बचाई गईं, जिनमें से अधिकांश 18 साल से कम उम्र की थीं।
टीमें अलग-अलग जिलों से भेजी गईं: हनुमंतल पुलिस स्टेशन प्रयागराज गया, गढ़ा पुलिस स्टेशन दिल्ली, गोखपुर जिसने झांसी की यात्रा की, और बरगी टीम नागपुर पहुँची। एक पुलिसकर्मी ने बताया, "हमने एक लड़की को एक छोटे से बेकार के कारखाने में ढूंढा, जहाँ उसे बार-बार बोलने से मना किया जाता था। जब हमने उसे बाहर निकाला, तो वह बस बोली — ‘मैं अपनी माँ को याद कर रही थी।’"
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में, सीनियर पुलिस सुपरिंटेंडेंट शशि मोहन सिंह ने 15 दिनों में 6 लड़कियों को बचाया। यह संख्या छोटी लग सकती है, लेकिन जब आप जानते हैं कि इनमें से एक लड़की 8 साल की थी और उसे एक बार गाँव से ले जाया गया था, तो यह एक जीत है।
बलरामपुर में, जुलाई के एक महीने में 19 बच्चे बचाए गए — 13 लड़कियाँ और 6 लड़के। यह जिला रायपुर के निर्देशों के तहत काम कर रहा था। यहाँ की पुलिस ने लोगों के घरों में घुसकर, बच्चों को छिपाए जाने की संभावना वाले कमरों की जांच की।
ऑपरेशन मुस्कान से पहले, जून 2025 में छत्तीसगढ़ पुलिस ने ऑपरेशन सर्च चलाया था, जिसमें 1,056 लुप्त महिलाएँ और पुरुष बचाए गए। इसके बाद जुलाई में ऑपरेशन मुस्कान के जरिए बिलासपुर में ही 151 बच्चे बचाए गए — जिससे दो महीने में एक जिले ने 1,200 से अधिक लुप्त व्यक्तियों को उनके परिवारों के पास लौटाया।
इस सफलता का रहस्य सिर्फ अधिकारियों की मेहनत नहीं है। यह एक नए दृष्टिकोण की शुरुआत है — जहाँ पुलिस सिर्फ फर्मान जारी नहीं करती, बल्कि जानकारी बाँटती है। मीडिया के साथ सहयोग, राज्यों के बीच साझा डेटाबेस, और अनुभवी टीमों का अंतरराज्यीय प्रसार — यही असली ताकत है।
पहले यह सोचा जाता था कि लुप्त बच्चे अनंत रूप से गायब हो जाते हैं। अब लोग जानते हैं कि अगर पुलिस जुट जाए, तो यह नहीं होता।
अब प्रशासन एक डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने की योजना बना रहा है, जहाँ लोग अपने लुप्त परिवार के सदस्यों की फोटो और विवरण अपलोड कर सकें। इसके अलावा, स्कूलों में बच्चों को अपने नाम, पते और माता-पिता का फोन नंबर याद कराया जाएगा। एक शिक्षक ने कहा, "अगर एक बच्चा अपने नाम को बोल सकता है, तो वह गायब नहीं हो सकता।"
बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली एक एनजीओ की अध्यक्ष ने कहा, "यह ऑपरेशन दिखाता है कि जब संसाधनों का सही उपयोग हो, तो लुप्त बच्चों का मामला सिर्फ एक आँकड़ा नहीं होता — वह एक इंसान होता है।"
ऑपरेशन मुस्कान में पुलिस टीमें लुप्त बच्चों के लिए रजिस्टर्ड केसों की समीक्षा करती हैं, फिर उनके अंतिम देखे जाने के स्थानों की जांच करती हैं। टीमें राज्यों के बीच यात्रा करती हैं, मीडिया के साथ सहयोग करती हैं, और बाजारों, ट्रेन स्टेशनों और अनाथालयों में छापे मारती हैं। डेटा साझा करने के लिए एक केंद्रीय डिजिटल डेटाबेस भी इस्तेमाल किया जाता है।
हाँ, लगभग सभी बच्चों को उनके परिवारों के साथ जोड़ दिया गया है। बिलासपुर में 151 बच्चों में से 148 को उनके घरों में वापस लाया गया। कुछ बच्चों के माता-पिता की मृत्यु हो चुकी थी, तो उन्हें अनाथालयों या संरक्षित आश्रयों में रखा गया। स्वास्थ्य और मानसिक समर्थन की व्यवस्था भी की गई है।
इस अभियान के बाद, बिलासपुर और जबलपुर में बच्चों के लुप्त होने की रिपोर्ट 37% तक कम हो गई है। लोगों में जागरूकता बढ़ी है — अब लोग अज्ञात व्यक्तियों के साथ बच्चों को ले जाते देखकर पुलिस को सूचित करते हैं। यह एक नई सामाजिक जिम्मेदारी का संकेत है।
हाँ, केंद्रीय मंत्रालय ने इस अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने का निर्देश दिया है। उत्तर प्रदेश और बिहार की पुलिस पहले से ही इसकी योजना बना रही हैं। अगले छह महीनों में एक राष्ट्रीय ऑपरेशन मुस्कान की घोषणा हो सकती है, जिसमें राज्यों के बीच डेटा साझा किया जाएगा।
हाँ, बिलासपुर में पुलिस ने एक ऐप इस्तेमाल किया जिसमें लुप्त बच्चों की फोटो, उनके अंतिम देखे जाने का समय और स्थान, और उनकी विशिष्ट पहचान विशेषताएँ (जैसे निशान, वस्त्र) अपलोड की गईं। यह ऐप पुलिस और नागरिकों दोनों के लिए उपलब्ध था — और इसके जरिए 23 बच्चों की पहचान हुई।
अब लक्ष्य यह है कि लुप्त बच्चों के मामले को रोका जाए, न कि उन्हें ढूंढा जाए। स्कूलों में बच्चों को अपने नाम, पता और परिवार का फोन नंबर याद कराने का काम शुरू हो चुका है। एक नया कानून भी तैयार किया जा रहा है जो बच्चों को अनधिकृत रूप से ले जाने वालों के खिलाफ कठोर सजा देगा।
12 जवाब
ये ऑपरेशन मुस्कान सिर्फ एक अभियान नहीं है ये तो एक जीवन बचाने का नाम है। बिलासपुर की टीम ने जो किया वो इतिहास बन गया। लड़कियों को बाजारों में छिपे हुए ढूंढना और उनकी आवाज़ सुनना जैसा काम बहुत कम लोग कर पाते हैं। मुझे लगता है ये मॉडल पूरे देश में चलाया जाना चाहिए।
बहुत अच्छा काम किया पुलिस वालों ने। लेकिन अब बच्चों को स्कूलों में अपना नाम और माता-पिता का नंबर याद कराना शुरू कर दो। एक छोटी सी बात बहुत बड़ा अंतर ला सकती है।
अरे भाई, जब तक घरों में बच्चों को बाहर भेजने की आदत नहीं बंद होगी, तब तक ऑपरेशन मुस्कान भी बस एक बड़ा रोशनी वाला लाल बल्ब होगा। असली समस्या तो वो है जो बच्चे घर से निकलते ही गायब हो जाते हैं।
इस अभियान की सफलता में राज्यों के बीच सहयोग का बहुत बड़ा योगदान है। अब तक हमने अकेले राज्यों के लिए अलग-अलग डेटाबेस देखे हैं। ये एक नया नमूना है। बस इसे बरकरार रखना होगा।
ये जो बच्चों को बचाया गया है वो बहुत बड़ी बात है लेकिन इसके बाद क्या होगा ये भी तो देखना है कि क्या उन्हें मानसिक सहायता मिलेगी क्या उनके परिवारों को समर्थन मिलेगा क्या स्कूल उन्हें वापस स्वीकार करेंगे क्या लोग उन्हें नहीं देखेंगे जैसे वो अलग हों और ये सब काम जो अभी शुरू हुआ है वो लगातार चलता रहे बिना किसी रुकावट के और ये बच्चे अपने बचपन को वापस पा सकें और फिर जीवन में आगे बढ़ सकें।
यह अभियान वास्तव में प्रशंसनीय है। पुलिस बल के अधिकारियों ने अत्यंत संवेदनशीलता और निष्ठा के साथ कार्य किया है। इस प्रकार के अभियानों को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देना आवश्यक है।
अरे यार, जब तक बच्चों को घर से निकालने वाले लोगों को जेल नहीं डालेंगे, तब तक ये सब बस एक नाटक है। आप बच्चों को बचा रहे हैं लेकिन उनके बाद जो बच्चे ले जा रहे हैं उन्हें तो बिल्कुल नहीं छू रहे।
क्या आपने कभी सोचा कि शायद ये बच्चे जानबूझकर गायब हो रहे हैं? शायद उनके परिवार उन्हें बेच रहे हैं? ये सब बहुत सुंदर लगता है लेकिन असलियत क्या है?
इस ऑपरेशन के बाद अब सब बच्चे बच गए? नहीं भाई, ये तो बस एक फिल्म का दृश्य है। असली दुनिया में लाखों बच्चे गायब हो रहे हैं और तुम एक जिले के 151 बच्चों को लेकर फुल्लाना शुरू कर दिया।
इतना बड़ा काम करने वाले पुलिस वालों को बधाई देनी चाहिए। ये देश के लिए गर्व की बात है। अगर हर जिले में ऐसी टीम हो तो भारत का हर बच्चा सुरक्षित हो जाएगा।
जब मैं छोटी थी, तो हमारे गाँव में एक लड़की गायब हो गई थी। कोई नहीं ढूंढा। आज जब मैं ये खबर पढ़ रही हूँ, तो लगता है वो लड़की अब जीवित हो सकती है। धन्यवाद, पुलिस।
इस ऑपरेशन का असली उद्देश्य तो लोगों के बीच एक फेक न्यूज़ फैलाना है। आपको लगता है कि ये बच्चे बच गए? नहीं, ये बच्चे अभी भी उन्हीं लोगों के पास हैं जिन्होंने उन्हें ले जाया था। पुलिस ने बस फोटो लिए और खबर फैला दी।