बिहार में बड़े पैमाने पर बायोगैस उत्पादन की एक नई शुरुआत की गई है। नितिश कुमार, मुख्यमंत्री ने 16 जनवरी 2026 को अपना 'समृद्धि यात्रा' कार्यक्रम शुरू करते ही पश्चिम चंपारण के बेठिया कस्बे में स्थित कुमारबाग बायोगैस प्लांट का उद्घाटन किया। यह राज्य का पहला लार्ज स्केल बायोगैस इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट है जिसकी दैनिक उत्पादन क्षमता 18,000 घन मीटर तय की गई है। सच कहें तो यह केवल ईंधन का स्रोत नहीं, बल्कि किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक नई आशा का दीया साबित हो सकता है।
प्रोजेक्ट निदेशक अनंत कुमार, आईटी से मैस्टर्स टिन टेक्नोलॉजी का कहना है कि वाणिज्यिक उत्पादन 23 जनवरी 2026 से正式开始 होने वाला है। उनके अनुसार, इसे पूरी क्षमता तक पहुँचने में लगभग 30 दिन का वक्त लगेगा। इस पूरे प्रोजेक्ट का खर्चा अनुमान लगाया गया 50 करोड़ रुपये बताया जा रहा है, हालाँकि कुछ रिपोर्ट्स में 60 करोड़ या फिर 100 करोड़ जैसी राशियाँ भी सामने आई हैं। यह अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है, लेकिन यकीन ये है कि निवेश बहुत बड़ा है।
प्लांट बनाने वाली कंपनी के पास कच्चे माल की कोई कमी नहीं होगी। यहाँ चीनी और गुड़ की मिलों से मिलने वाले बगेस, प्रेसमड और गाय के गोबर का इस्तेमाल होगा। साथ ही धान, मक्का और सरसों जैसे फसलों की फसल अवशेष का भी उपयोग किया जाएगा। जिन्दा उद्योग महानगर प्रबंधक रोहित राज ने कहा कि यह बायोगैस सीएनजी की तुलना में सस्ता और पर्यावरण के लिए बेहतर रहेगा। उनकी योजना है कि यह ईंधन पूर्वी और पश्चिमी चंपारण और गोपालगंज के सीएनजी स्टेशनों पर आपूर्ति जाएगी।
सवाल केवल ऊर्जा का नहीं, बल्कि रोजगार का भी है। पंखाबत्ती खबर के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट से लगभग 300 परिवारों को सीधा या परोक्ष रूप से रोजगार मिलने का अनुमान है। यह काम कच्चे माल की व्यवस्था, परिवहन और अन्य सहायक गतिविधियों से जुड़ा हुआ है। मुख्यमंत्री नितिश कुमार ने इसे राज्य की हरित विकास नीति का महत्वपूर्ण आधार कहा है। वे समझते हैं कि अगर हम गांवों के अपशिष्ट को वैज्ञानिक तरीके से ऊर्जा में बदल सकें, तो प्रदूषण भी कम होगा और किसानों की आय भी बढ़ेगी।
यह फैसला सिर्फ बेठिया तक सीमित नहीं है। रोहित राज ने जोर देकर कहा कि यह परियोजना छह अन्य जिलों के लिए भी रास्ता दिखा सकती है। जब सीएनजी की कीमतें बढ़ रही हैं, तो ऐसे वैकल्पिक ईंधन का विकल्प दिखना आम लोगों के लिए राहत की बात है। इसके अलावा, इस प्रक्रिया में 40 टन फॉस्फेट युक्त जैविक खाद भी बनेगी, जो कृषि के लिए सोने जैसी कीमत रखती है।
उधर, इंडियन बायोगैस एसोसिएशन ने संसद के बजट सत्र में अपनी मांगें बढ़ा दी हैं। उन्होंने 10,000 करोड़ रुपये का पूंजी सब्सिडी फंड मांगा है। समस्या यह है कि 2014 से अब तक सीबीजी (Compressed Bio Gas) प्लांट बनाने का खर्चा 50 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ चुका है। वर्तमान सरकार प्रतिदिन 4.8 टन क्षमता वाले प्लांट पर 4 करोड़ रुपये की सब्सिडी दे रही है, जिसकी अधिकतम सीमा 10 करोड़ रुपये है।
संघ ने सरकार को सलाह दी है कि इस सीमा को बढ़ाकर 25 करोड़ रुपये कर दिया जाए। इसके अलावा, कार्बनเครดิต के लिए एक स्पष्ट ढांचे की जरूरत है ताकि इन प्लांटों को वित्तीय लाभ हो सके। आज भी रसायनिक खादों पर देने वाली सब्सिडी की तुलना में ऑर्गेनिक फार्मिंग के लिए बजट बहुत कम है।
जब तक यह प्लांट पूरी तरह चल नहीं पड़ेगा, तब तक परिणाम देखने के लिए रुकना होगा। हालाँकि, यदि 2026 की शुरुआत सफल रहती है, तो यह बिहार को ऊर्जा स्वयंसंबंध बनाने में मदद करेगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनाने योग्य है। सरकार के पास अब समय है कि वह इन सब्सिडी नियमों को तेजी से बदले ताकि और निवेशक आगे आए।
हाँ, डिस्ट्रिक्ट इंडस्ट्री मैनेजर रोहित राज ने पुष्टि की है कि उत्पादन खर्च CNG के मुकाबले कम रहेगा। इसलिए सीएनजी स्टेशन पर उपलब्ध होने पर यह ग्राहकों के बजट के लिए अधिक व्यावहारिक विकल्प होगा।
मीडिया रिपोर्ट्स में अलग-अलग संख्याएं आ रही हैं। प्रभात खबर के अनुसार यह 50 करोड़ रुपये है, जबकि कुछ सूत्रों का कहना है कि 100 करोड़ रुपये तक हो सकता है। अंतिम आंकड़े आधिकारिक घोषणा पर निर्भर हैं।
यह प्लांट शुगर मिल्स के बग़ासे, प्रेसमड, गाय के गोबर और स्थानीय कृषि अपशिष्ट जैसे धान और सरसों की फसल अवशेषों का उपयोग करेगा।
इंडियन बायोगैस एसोसिएशन ने बजट 2026 में 10,000 करोड़ का फंड और प्रोजेक्ट सब्सिडी सीमा को 10 करोड़ से बढ़ाकर 25 करोड़ करने की मांग की है।